॥ दोहा ॥

श्री गणपति गुरु पद कमल, धरें ध्यान मन लाई।
श्री भैरव चालीसा कहूँ, कृपा करहु शिव नाई॥
जय जय श्री काली के लाला। जय जय जय भैरव कृपाला॥

॥ चौपाई ॥

जय शिव रूप भैरव बलवाना। जय जय जय कपाली भगवाना॥
जय बटुक भैरव अति कामा। जय जय काल भैरव गुणधामा॥
तुमहीं सब जन के रखवाले। संकट हरण रूप विकराले॥
वाहन श्वान सोहत अति भारी। त्रिशूल खप्पर कर में धारी॥
गल में मुंडमाल सोहावै। मस्तक पर सिंदूर सुहावै॥
काम क्रोध सब दूर भगावै। जो नर तुमको ध्यान लगावै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै। भैरव नाम जो जप मन लावै॥
डाकिनी शाकिनी भागे दूर्य। तुम सम बलवन्त नहिं कोऊ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश ध्यावैं। तुम्हारा पार न कोऊ पावैं॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै भैरव बलबीरा॥
जय जय जय भैरव अविनाशी। कृपा करो मम संकट नाशी॥
जो यह पढ़े भैरव चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीशा॥
तुलसीदास या कोई ध्यावै। मनवांछित फल सो जन पावै॥
जय जय श्री भैरव सुखकारी। हरहु सकल दुख विपत्ति हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्य नेम करि प्रातः ही, पाठ करै जो कोय।
ताहि सहाय भैरव करें, मनवांछित फल होय॥

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